निगल हजारों जिन्दगी गैस गई भोपाल
कितनों के जन्मे कई लूले-लंगड़े लाल
लूले-लंगड़े लाल, दर्द से भर कर आहें
रहे मांगते 'न्याय' नित्य फैला कर बाहें
दिव्यदृष्टि इस भांति सदी बीती चौथाई
किन्तु दंड की गूंज नहीं पड़ रही सुनाई
सोमवार, 7 जून 2010
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1 टिप्पणी:
दिव्यदृष्टि इस भांति सदी बीती चौथाई
किन्तु दंड की गूंज नहीं पड़ रही सुनाई
बहुत सही !!
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