शुक्रवार, 10 अक्तूबर 2008

बूढ़ा है तो क्या हुआ, है तो आखिर शेर

बूढ़ा है तो क्या हुआ, है तो आखिर शेर
बड़े मेमनों को अभी, कर सकता है ढेर
कर सकता है ढेर, उसे हल्के मत लेना
है काबू में अब भी उसकी अपनी सेना
दिव्यदृष्टि जब पड़े 'सामना' उससे प्यारे
छुटभैयों को दिन में भी दीखेंगे तारे

2 टिप्‍पणियां:

फ़िरदौस ख़ान ने कहा…

बहुत ख़ूब कहा आपने...

श्रीकांत पाराशर ने कहा…

Wah saheb kya divya drasti hai. achha laga .

यह मैं हूं

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