शनिवार, 7 जून 2008

बढ़ता कारोबार बाप-माई के डर से

दिव्यदृष्टि होता अगर मंत्री की औलाद
शोहरत पाता रातदिन दुनिया देती दाद
दुनिया देती दाद , दरिद्दर जाता घर से
बढ़ता कारोबार बाप-माई के डर से
खूब मजे से सुनता राग-रागिनी धीमा
दौड़े आते लोग कराने जीवन बीमा

1 टिप्पणी:

बाल किशन ने कहा…

मेरी भी यही पीडा है.

यह मैं हूं

यह मैं हूं

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