शुक्रवार, 30 मई 2008

चली न कोई चाल फंस गया खूनी पंजा

बनते थे जो कल तक ग्वाले अफलातून
बता रहा औकात अब उनको ही कानून
उनको ही कानून, कसा इस कदर शिकंजा
चली न कोई चाल फंस गया खूनी पंजा
दिव्यदृष्टि नीतीश हो गया मर कर नक्की
हत्यारे लेकिन जीवनभर पीसें चक्की

1 टिप्पणी:

बाल किशन ने कहा…

सही और करारा लेखन.
बधाई.

यह मैं हूं

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