जिन्हें समझ शरणार्थी दी थी कभी पनाह
अब उनके मन में उठी होम लैंड की चाह
होम लैंड की चाह, बढ़ा कर ताकत भारी
नए इलाके की करते शातिर तैयारी
दिव्यदृष्टि इसलिए न भारत देर लगाए
उन्हें बांग्लादेश तुरत वापस भिजवाए
सोमवार, 10 अगस्त 2009
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
यह मैं हूं
ब्लॉग आर्काइव
-
▼
2009
(292)
-
▼
अगस्त
(27)
- राजनाथ के साथ 'राम' का भजन कीजिए
- बहुत भाजपा में बढ़ी जब जूतम पैजार
- बसपा को बदनाम करे चंदे का धंधा
- मान गए 'मी लॉर्ड' करें जाहिर प्रॉपर्टी
- बीजेपी में बेसुरा बजा बगावत राग
- सोये सुख की सेज सजन के संग किशोरी
- फौरन कटी पतंग की संघ थाम ले डोर
- छुटभैयों के हाथ ज्यों आई मोटर कार
- जिस अडवानी के लिए बोला मैंने झूठ
- अद्भुत भारतवर्ष में न्यायालय का सीन
- मन राखी सावंत का बहुत रहा है डोल
- पेट भरें किस भांति जुगत बतलाओ पुत्तर
- इसीलिए हो गए एक झटके में आउट
- आये दिन ईमान बेचते अपना शातिर
- दिखलाया कप्तान ने धमकीवाला हाथ
- वही राइटर दुनिया में फौरन बिक जाए
- दी हमको सरकार ने सौ दिन रोटी-दाल
- 'पंचशील' का रोयेंगे तब पंडित दुखड़ा
- निंदक को क्यों जान-बूझकर गले लगाये
- उन्हें बांग्लादेश तुरत वापस भिजवाए
- करें शिष्ट व्यवहार कीमती समय बचाएं
- दिए दर्जनों मार तनिक भी लाज न आई
- जब मांगे कश्मीर तमाचा मुंह पर धरिए
- भाई बनकर राखी से 'राखी' बंधवा लें
- जमकर भ्रष्टाचार कर रहे तेल मिनिस्टर
- राखी ने चुन ही लिया दूल्हा आखिरकार
- बूटा का बेटा गया पकड़ा लेते घूस
-
▼
अगस्त
(27)
2 टिप्पणियां:
नहीं भिजवाएंगे. हमें वोट चाहिए. यही हमारे वोटर हैं.
फूलों की मत पूछो
पूरा कूड़ेदान सजा कर रखा है।
इधर उधर कहाँ जाते हो?
कहाँ थूकोगे, कहाँ मूतोगे?
देखो, तुम्हारे बिगाड़ने को,
पूरा हिन्दुस्तान बना रक्खा है।
______________________________
यह शब्द पुष्टिकरण हटाएँ महोदय, निहायत ही बेकार सी उलझन है।
एक टिप्पणी भेजें